Emotional Shayari On Khamoshi

Emotional Shayari status

Emotional Shayari in hindi

उसने कहा बैठे हो क्यू गुमसुम, सुना दो कोई दास्तान।

मन मेरा बहल जाये, यार तुम ऐसा करो कुछ ब्यान।

उस पागल को कैसे समझाता, के मैं खुद एक किस्सा बन गया हूँ।

बर्बादी की लपेटे हूँ चादर, और खामोशी का मैं हिस्सा बन गया हूँ।

अपने हाथों से ही छीन ली, मैंने मेरे होठों की मुस्कान।

उसने कहा बैठे हो क्यू …………………………………………

इसे बदनसीबी का नाम देके, नशीब की तौहीन करू कैसे।

काँटे बो लिए थे ज़िंदगी में, अब दामन फूलों से भरु कैसे।

जिन्हे अपना समझा वो गैर निकले, अपनों से रहा अनजान।

उसने कहा बैठे हो क्यू ………………………………………..

Emotional Shayari status

कैसे सुनाऊ मैं उसे, अपनी बर्बादी की कहानी।

देख ना पाऊंगा मैं, नादाँ यार के नैनो में पानी।

कैसे छोड़ दू मैं उसकी ज़िंदगी में उदासी का कोई निशान।

उसने कहा बैठे हो क्यू ………………………………………..

यही वजह थी की खामोशी का दामन ना मैंने छोड़ा।

बदनाम कहीं वो ना हो जाये, इसलिए मैंने मुँह मोड़ा।

ना चाहते हुए भी छुपानी थी, उसे बर्बाद कर देती मेरी पहचान।

उसने कहा बैठे हो क्यू ………………………………………..

Emotional Shayari Kabhi Rubru Hui Naa Khushiya…

कभी रूबरू हुई ना खुशियाँ, के मुझे मिले दर्द ऐ गम ही ऐसे थे।

मुकमल होता भी कैसे सुकून, ढाने वालों के सितम ही ऐसे थे।

गुजरता गया वक़्त और हम सहते रहे, खून के आंसू थे और बहते रहे।

टूट के एक दिन बिखर जाओगे, कुछ चाहने वाले ये कहते रहे।

ना कभी भरे, ना कभी भरेंगे, मिले मुझे जख्म ही ऐसे थे।

कभी रूबरू हुई ना खुशियाँ …………………………………….

मैं करता तो भी क्या यारों, इस कदर वक़्त के हाथों मजबूर था।

ज़िंदगी बिक गई थी मेरी बदनशीबी के हाथों, फिजाओं से कोषों दूर था।

किसी भी हद तक गुजरना आम बात थी, वो बेरहम ही ऐसे थे।

कभी रूबरू हुई ना खुशियाँ …………………………………….

Emotional Shayari in hindi

जब याद आते हैं वो फरेब रूह मेरी काँप जाती है,

इस कदर टुटा हूँ, खुद की सूरत भी ना राश आती है।

बरसों गुजर गए मुझे आईना देखे,

मुस्कुराऊ मैं कैसे अब तो परछाई भी डरती है।

कैसे भरते दिल ऐ ज़ख्म, लगाने वालों के मरहम ही ऐसे थे।

कभी रूबरू हुई ना खुशियाँ …………………………………….

कुदरत का हो जाये कोई करिश्मा ऐसा,

के दूर कहीं काईन भाग जाऊ।

इस ज़िंदगी से तो अच्छा ही होगा,

अंजाम मेरा और लौट के ना आऊ।

सोचता हु किस बात की थी ये सजा, क्या कहीं मेरे कर्म ही ऐसे थे।

कभी रूबरू हुई ना खुशियाँ ………….

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